अंतरिक्ष यात्रा का सपना अब सिर्फ स्वस्थ लोगों तक सीमित नहीं रहा। कल्पना कीजिए, जहां गुरुत्वाकर्षण शून्य हो, विकिरण का खतरा हो और दिन-रात का चक्र बिगड़ जाए, वहां डायबिटीज जैसी पुरानी बीमारी को कैसे मैनेज किया जाए? 2025 में Axiom Mission 4 (Ax-4) के दौरान हुए एक ऐतिहासिक शोध ने इसी सवाल का जवाब दिया। “Suite Ride” नामक इस प्रोजेक्ट ने पहली बार अंतरिक्ष में इंसुलिन पेन और कंटीन्यूअस ग्लूकोज मॉनिटर्स (CGM) का सफलतापूर्वक परीक्षण किया। यह शोध न केवल स्पेस ट्रैवल को अधिक समावेशी बनाता है, बल्कि पृथ्वी पर करोड़ों डायबिटीज मरीजों के लिए नई चिकित्सा संभावनाएं खोलता है।
अंतरिक्ष में पहली बार इंसुलिन और ब्लड शुगर पर होने वाला शोध
मानव शरीर पर अंतरिक्ष का प्रभाव विज्ञान के लिए हमेशा एक रहस्य रहा है। लेकिन अब पहली बार अंतरिक्ष में इंसुलिन और ब्लड शुगर पर विस्तृत शोध होने जा रहा है। यह प्रयोग न केवल अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि पृथ्वी पर डायबिटीज़ (मधुमेह) के इलाज में भी एक नई दिशा दिखा सकता है।
यह शोध कब और कहाँ हो रहा है?
यह ऐतिहासिक प्रयोग अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर किया जा रहा है। इसे NASA और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के वैज्ञानिकों ने मिलकर डिजाइन किया है। मिशन का उद्देश्य यह समझना है कि जब इंसान माइक्रोग्रैविटी (microgravity) में रहता है, तो इंसुलिन के स्राव, ब्लड शुगर स्तर, और शरीर की मेटाबोलिक गतिविधियों में क्या बदलाव आते हैं।

इंसुलिन और ब्लड शुगर पर शोध की ज़रूरत क्यों पड़ी?
पृथ्वी पर, हमारे शरीर का मेटाबोलिज्म गुरुत्वाकर्षण के अनुसार काम करता है। लेकिन जब कोई अंतरिक्ष में जाता है, तो उसका शरीर एक नई परिस्थिति में पहुँच जाता है ।
- मांसपेशियों की मात्रा कम होती है
- बोन डेन्सिटी घटती है
- ब्लड फ्लो और हार्मोनल संतुलन बदल जाता है
इन परिवर्तनों का सीधा असर इंसुलिन पर भी पड़ता है। वैज्ञानिक यह जानना चाहते हैं कि क्या अंतरिक्ष की यह स्थिति डायबिटीज़ के उपचार या रोकथाम में कोई नई जानकारी दे सकती है।
माइक्रोग्रैविटी में शरीर कैसे बदलता है?
अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण लगभग शून्य होता है। इस वजह से रक्त का प्रवाह ऊपर की ओर बढ़ जाता है और शरीर के अंगों का संतुलन बिगड़ता है।
माइक्रोग्रैविटी में:

- शरीर इंसुलिन रेसिस्टेंट (Insulin Resistant) हो सकता है
- ब्लड शुगर स्तर नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है
- मांसपेशियों और फैट सेल्स में ग्लूकोज का उपयोग कम हो जाता है
यह सभी बातें डायबिटीज़ जैसी बीमारी को समझने के लिए बेहद उपयोगी डेटा प्रदान कर सकती हैं।
पृथ्वी पर डायबिटीज़ के इलाज में कैसे मदद मिलेगी?
यह शोध केवल अंतरिक्ष तक सीमित नहीं रहेगा। इससे मिलने वाला डेटा पृथ्वी पर टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज़ के मरीजों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है। संभावित लाभ:
- नई इंसुलिन दवाओं का विकास
- बेहतर ब्लड शुगर मॉनिटरिंग तकनीकें
- सेल थेरेपी और टिश्यू इंजीनियरिंग में नई दिशा
- मरीजों के लिए व्यक्तिगत (personalized) उपचार योजना
अंतरिक्ष यात्रा की चुनौतियां: क्यों डायबिटीज एक बाधा बनी हुई थी?

अंतरिक्ष में मानव जीवन की कल्पना करने पर सबसे पहले स्वास्थ्य चुनौतियां सामने आती हैं। NASA जैसी एजेंसियां लंबे समय से टाइप-1 डायबिटीज को एस्ट्रोनॉट सिलेक्शन का आधार बनाती रही हैं। कारण? माइक्रोग्रैविटी (शून्य गुरुत्वाकर्षण) में ब्लड शुगर लेवल अनियंत्रित हो सकता है। इंसुलिन इंजेक्शन देना मुश्किल होता है क्योंकि तरल पदार्थ तैरते रहते हैं, और विकिरण या सर्कैडियन रिदम (दिन-रात चक्र) के बिगड़ने से ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म प्रभावित होता है। इस शोध ने न केवल स्पेस हेल्थ को प्रभावित किया, बल्कि पृथ्वी पर रिमोट हेल्थकेयर के लिए भी नई राहें खोलीं, जैसे तेल रिग्स पर काम करने वाले वर्कर्स के लिए।
Suite Ride प्रोजेक्ट: अंतरिक्ष में डायबिटीज मैनेजमेंट का पहला कदम
Suite Ride प्रोजेक्ट Axiom Space और Burjeel Holdings का संयुक्त प्रयास था, जो जून 2025 में Ax-4 मिशन के दौरान इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पर संपन्न हुआ। यह 18-दिन का मिशन था, जिसमें क्रू ने 320 ऑर्बिट्स पूरे किए और 84 लाख मील की दूरी तय की। मिशन कमांडर पेगी व्हिटसन (पूर्व NASA एस्ट्रोनॉट), भारतीय ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला, पोलिश इंजीनियर स्लावोश उज्नांस्की और हंगेरियन रिसर्चर टिबोर कापू शामिल थे।
यह शोध कई “फर्स्ट्स” हासिल करने वाला था:
- ISS पर क्रू का पहला कंटीन्यूअस ग्लूकोज मॉनिटरिंग।
- स्टेशन पर पहली बार इंसुलिन पेन उड़ाए गए।
- ग्लूकोज मॉनिटरिंग के कई तरीकों का वैलिडेशन।
शोध की विधि: कैसे किया गया इंसुलिन और ब्लड शुगर का परीक्षण?
Suite Ride शोध की वैज्ञानिक विधि सरल लेकिन सटीक थी। क्रू मेंबर्स ने मिशन से पहले और बाद में डेटा कलेक्ट किया।

- कंटीन्यूअस ग्लूकोज मॉनिटर्स (CGM): ये छोटे डिवाइस स्किन पर लगाए जाते हैं और रीयल-टाइम ब्लड शुगर लेवल ट्रैक करते हैं। स्पेस में, इन्हें माइक्रोग्रैविटी, रेडिएशन और सर्कैडियन डिसरप्शन के प्रभाव में टेस्ट किया गया। डेटा स्पेस से ग्राउंड पर भेजा गया और बैक, जिससे एंड-टू-एंड मॉनिटरिंग साबित हुई।
- इंसुलिन पेन: ये पोर्टेबल डिवाइस इंसुलिन डोज देते हैं। वर्जिन गैलेक्टिक फ्लाइट पर इनका डोजिंग टेस्ट हुआ, जो ISO गाइडलाइंस के अनुरूप पाया गया। Ax-4 पर इन्हें ISS पर भेजा गया, और पोस्ट-फ्लाइट एनालिसिस में फॉर्मूलेशन की इंटीग्रिटी चेक की गई।
तुलना के लिए, पारंपरिक फिंगर-प्रिक टेस्ट और लैब एनालिसिस का उपयोग किया गया। कारक जैसे वाइब्रेशन, प्रेशर चेंजेस और फ्लूइड शिफ्ट्स को अलग-अलग आइसोलेट किया गया। डॉ. मोहम्मद फित्यान, बुरजील होल्डिंग्स के चीफ मेडिकल ऑफिसर ने कहा, “हमने देखा कि CGM डिवाइस स्पेस में भी अर्थ-बेस्ड एक्यूरेसी के साथ काम करते हैं।”
यह विधि न केवल सुरक्षित थी, बल्कि 60 से अधिक रिसर्च एक्टिविटीज का हिस्सा बनी, जो प्राइवेट स्पेसफ्लाइट की ताकत दिखाती है।
भविष्य की संभावनाएं: डायबिटीज वाले एस्ट्रोनॉट्स का सपना साकार होता हुआ

यह शोध स्पेस ट्रैवल को समावेशी बनाता है। NASA अब टाइप-1 डायबिटीज को डिसक्वालिफायर नहीं मान सकती। बुरजील होल्डिंग्स ने घोषणा की कि वे पहला डायबिटीज एस्ट्रोनॉट स्पेस भेजेंगे। भविष्य में, लॉन्ग-ड्यूरेशन मिशन्स (जैसे मार्स) के लिए ये टूल्स क्रूसियल होंगे। Axiom Space और बुरजील की पार्टनरशिप क्रॉनिक डिजीज मैनेजमेंट पर फोकस करेगी। कल्पना कीजिए, जहां डायबिटीज डायग्नोसिस स्पेस ड्रीम को रोक न सके। यह प्रेरणा हर उस व्यक्ति को देगा जो बीमारी से जूझते हुए भी बड़े सपने देखता है।
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