डायबिटीज़, जिसे मधुमेह भी कहा जाता है एक ऐसी बीमारी है जो दुनिया भर में करोड़ों लोगों को प्रभावित करती है। हम सभी टाइप -1 और टाइप – 2 डायबिटीज़ के बारे में जानते हैं, लेकिन हाल ही में एक नई श्रेणी की पहचान हुई है – टाइप 5 डायबिटीज़। अप्रैल 2025 में इंटरनेशनल डायबिटीज़ फेडरेशन (IDF) ने आधिकारिक रूप से इसे मान्यता दी है। यह डायबिटीज़ कुपोषण से जुड़ी हुई है और मुख्य रूप से विकासशील देशों में पाई जाती है, जहां भोजन की कमी एक बड़ी समस्या है। अगर आप “टाइप 5 डायबिटीज़ क्या है” या “type 5 diabetes symptoms in hindi” सर्च कर रहे हैं, तो यह ब्लॉग पोस्ट आपके लिए है।
टाइप-5 डायबिटीज़ क्या है?
टाइप-5 डायबिटीज़ को हाल ही में एक नए प्रकार के रूप में पहचाना गया है, जिसे शोधकर्ताओं ने पारंपरिक टाइप-1 और टाइप-2 से अलग माना है। यह प्रकार मुख्य रूप से किडनी और इंसुलिन के आपसी असंतुलन से जुड़ा है। इसमें शरीर की कोशिकाएँ इंसुलिन का सही तरीके से उपयोग नहीं कर पातीं, लेकिन टाइप-2 की तरह केवल जीवनशैली या मोटापे से जुड़ा नहीं होता। कई बार यह जेनेटिक म्यूटेशन या ऑटोइम्यून कारणों से भी विकसित हो सकता है। इसे ज्यादा जटिल और गंभीर माना जाता है क्योंकि इसमें ब्लड शुगर नियंत्रण के साथ-साथ किडनी, हृदय और अन्य अंगों पर भी असर दिख सकता है। डॉक्टरों के अनुसार, टाइप-5 डायबिटीज़ की पहचान और इलाज के लिए अधिक रिसर्च की जरूरत है ताकि मरीजों को सही उपचार मिल सके।
अब तक कितनी तरह की डायबिटीज़ थी?

डायबिटीज़ को अब तक मुख्य रूप से चार प्रकारों में बाटा गया था. पहला है टाइप-1 डायबिटीज़, जो इंसुलिन-निर्भर होती है और यह आमतौर पर बच्चों व युवाओं में पाई जाती है। दूसरा है टाइप-2 डायबिटीज़, जो सबसे आम है और जीवनशैली, मोटापा व इंसुलिन रेजिस्टेंस से जुड़ी होती है। तीसरा है गर्भावधि डायबिटीज़ (Gestational Diabetes) जो गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में होती है और जन्म के बाद अक्सर ठीक हो जाती है लेकिन आगे चलकर टाइप-2 का खतरा बढ़ा देती है। चौथा प्रकार है Monogenic Diabetes, जो दुर्लभ जेनेटिक कारणों से होती है और बहुत कम लोगों में देखी जाती है। अब शोधकर्ताओं ने इन सबके अलावा टाइप-5 डायबिटीज़ की भी पहचान की है, जिससे यह समझना और जरूरी हो जाता है कि डायबिटीज़ एक जटिल और बहु-आयामी रोग है।
टाइप-5 डायबिटीज़ के कारण
टाइप-5 डायबिटीज़ का मुख्य कारण बचपन या गर्भावस्था के दौरान कुपोषण है। जब बच्चे को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता तो पैंक्रियास की ग्रोथ प्रभावित होती है। इससे बीटा सेल्स जो इंसुलिन बनाती हैं, कम विकसित होती हैं। नतीजा – ब्लड शुगर कंट्रोल नहीं हो पाता। यह बीमारी मुख्य रूप से निम्न और मध्यम आय वाले देशों (LMICs) में पाई जाती है. जैसे भारत, बांग्लादेश, नेपाल, अफ्रीका के सब-सहारन क्षेत्र। अमेरिका में भी, फोस्टर केयर वाले बच्चे या प्रवासियों में यह देखी जा सकती है। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि बेरिएट्रिक सर्जरी या एटिंग डिसऑर्डर से वजन कम होने पर भी समान लक्षण दिख सकते हैं।
टाइप-5 डायबिटीज़ के लक्षण
टाइप-5 डायबिटीज़ के लक्षण अन्य प्रकारों से मिलते-जुलते हैं, लेकिन यह युवा और दुबले-पतले लोगों में अधिक दिखते हैं। मुख्य लक्षण हैं:
- अत्यधिक प्यास लगना (पॉलीडिप्सिया)
- बार-बार पेशाब आना (पॉलीयूरिया)
- अकारण वजन घटना
- थकान और कमजोरी
- धुंधला दिखना
- भूख ज्यादा लगना लेकिन वजन न बढ़ना
- त्वचा में संक्रमण या घाव ठीक न होना

ये लक्षण कुपोषण के संकेतों के साथ मिलकर आते हैं, जैसे कि कम BMI, बालों का झड़ना या त्वचा का सूखना। अगर अनुपचारित छोड़ दिया जाए, तो यह आंखों, किडनी, नर्व्स और हृदय को नुकसान पहुंचा सकता है। युवा आयु (30 वर्ष से कम) में शुरू होना इसका एक प्रमुख संकेत है।
टाइप-5 डायबिटीज़ का निदान
निदान में ब्लड ग्लूकोज टेस्ट मुख्य है। अगर फास्टिंग ब्लड शुगर 126 mg/dL से ज्यादा या रैंडम 200 mg/dL से ज्यादा है, तो डायबिटीज़ की पुष्टि होती है। लेकिन टाइप 5 को अलग करने के लिए:-
- इतिहास: बचपन में कुपोषण का रिकॉर्ड
- BMI: 19 kg/m² से कम
- उम्र: 30 वर्ष से कम
- यूरिन में कीटोन्स की अनुपस्थिति (टाइप 1 में होती है)
- एंटीबॉडी टेस्ट: ऑटोइम्यून न होने की पुष्टि
LMICs में उन्नत टेस्ट की कमी से इसे टाइप 1 समझ लिया जाता है। IDF का नया वर्किंग ग्रुप डायग्नोस्टिक क्राइटेरिया बना रहा है, जो 2 वर्षों में तैयार होगा।
टाइप-5 डायबिटीज़ का उपचार

टाइप-5 डायबिटीज़ का उपचार फिलहाल अन्य प्रकार की डायबिटीज़ की तरह ही किया जाता है, क्योंकि यह अभी अपेक्षाकृत नया और रिसर्च के अधीन है। इस स्थिति में सबसे पहले ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने पर ध्यान दिया जाता है, जिसके लिए इंसुलिन थेरेपी या ओरल मेडिकेशन का सहारा लिया जा सकता है। मरीज को नियमित डायट प्लान, जिसमें कम कार्बोहाइड्रेट, उच्च फाइबर और पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार शामिल हो, अपनाने की सलाह दी जाती है। शारीरिक व्यायाम और योग जैसी गतिविधियाँ इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाने में मदद करती हैं। गंभीर मामलों में, डॉक्टर जीन थेरेपी और उन्नत मेडिकल ट्रायल्स की भी सलाह दे सकते हैं। सबसे ज़रूरी है कि मरीज नियमित रूप से ब्लड शुगर मॉनिटरिंग करे और विशेषज्ञ डॉक्टर के संपर्क में रहे, ताकि बीमारी को लंबे समय तक नियंत्रित रखा जा सके।
टाइप-5 डायबिटीज़ की रोकथाम
टाइप-5 डायबिटीज़ दुर्लभ और रिसर्च आधारित प्रकार है, लेकिन फिर भी इसकी रोकथाम के लिए स्वस्थ जीवनशैली सबसे अहम भूमिका निभाती है। संतुलित आहार लेना, जिसमें हरी सब्ज़ियाँ, साबुत अनाज और प्रोटीनयुक्त भोजन शामिल हो, इंसुलिन सेंसिटिविटी को बेहतर बनाने में मदद करता है। रोज़ाना कम से कम 30–40 मिनट का व्यायाम, जैसे वॉकिंग, योग या कार्डियो, ब्लड शुगर कंट्रोल में सहायक होता है। तनाव प्रबंधन (Stress Management) भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि लगातार तनाव हार्मोनल असंतुलन को बढ़ा सकता है। शराब और धूम्रपान से बचना तथा पर्याप्त नींद लेना भी जरूरी है। इसके अलावा, जिनके परिवार में डायबिटीज़ का इतिहास है, उन्हें नियमित ब्लड शुगर टेस्ट कराते रहना चाहिए ताकि बीमारी की शुरुआती अवस्था में ही पहचान और रोकथाम संभव हो सके।
रोकथाम का फोकस कुपोषण पर है:-
- मातृ एवं शिशु पोषण कार्यक्रम
- फूड सिक्योरिटी सुनिश्चित करना
- सरकारी योजनाएं जैसे भारत की पोषण अभियान
- स्कूलों में न्यूट्रिशन एजुकेशन
भारत में टाइप-5 डायबिटीज़ की स्थिति

भारत को “डायबिटीज़ कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड” कहा जाता है क्योंकि यहां डायबिटीज़ के रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। हालांकि टाइप-5 डायबिटीज़ अभी एक नया और रिसर्च-आधारित वर्गीकरण है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके केस भारत में भी मौजूद हो सकते हैं, जिन्हें अभी तक सही तरीके से पहचाना नहीं गया है। भारत में ज्यादातर लोग टाइप-2 डायबिटीज़ से प्रभावित हैं, मगर हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि टाइप-5 जैसे दुर्लभ प्रकार भी यहां देखने को मिल सकते हैं। समस्या यह है कि जागरूकता और डायग्नोसिस की कमी के कारण इन्हें अक्सर टाइप-2 या अन्य प्रकार मान लिया जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भारत में टाइप-5 डायबिटीज़ की पहचान और आंकड़े सामने आएंगे, जिसके लिए एडवांस मेडिकल टेस्टिंग और रिसर्च बेहद ज़रूरी है।
टाइप-5 डायबिटीज़ से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. टाइप-5 डायबिटीज़ क्या है?
टाइप-5 डायबिटीज़ डायबिटीज़ का एक नया और दुर्लभ वर्गीकरण है, जिसे रिसर्च के आधार पर पहचाना गया है। इसमें मरीजों के लक्षण और प्रभाव बाकी प्रकारों से अलग होते हैं।
2. अब तक डायबिटीज़ के कितने प्रकार माने जाते थे?
पहले डायबिटीज़ को मुख्य रूप से चार प्रकारों – टाइप 1, टाइप 2, जेस्टेशनल और सेकेंडरी डायबिटीज़ में बांटा गया था। अब रिसर्च के आधार पर टाइप-5 जैसे नए वर्ग भी सामने आ रहे हैं।
3. टाइप-5 डायबिटीज़ किस वजह से होती है?
इसका सही कारण अभी रिसर्च में है, लेकिन माना जाता है कि जेनेटिक फैक्टर, इंसुलिन रेगुलेशन की गड़बड़ी और लाइफस्टाइल इसकी वजह हो सकते हैं।
4. क्या टाइप-5 डायबिटीज़ भारत में भी पाई जाती है?
हाँ, हालांकि इसके केस बहुत कम हैं और सही पहचान की कमी के कारण अक्सर इसे अन्य प्रकार की डायबिटीज़ मान लिया जाता है।
5. टाइप-5 डायबिटीज़ के लक्षण क्या हो सकते हैं?
लगातार थकान, वज़न में कमी, ब्लड शुगर का असामान्य स्तर और सामान्य उपचार पर कम असर होना इसके संभावित लक्षण हो सकते हैं।
6. टाइप-5 डायबिटीज़ का इलाज कैसे होता है?
इलाज मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। इसमें इंसुलिन थेरेपी, ब्लड शुगर कंट्रोल दवाएं, डाइट मैनेजमेंट और रेगुलर एक्सरसाइज शामिल हो सकते हैं।
7. क्या टाइप-5 डायबिटीज़ पूरी तरह ठीक हो सकती है?
अभी तक इसका कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है। यह लाइफस्टाइल और दवाओं से नियंत्रित की जा सकती है।
8. टाइप-5 डायबिटीज़ और टाइप-2 डायबिटीज़ में क्या फर्क है?
टाइप-2 में इंसुलिन रेज़िस्टेंस मुख्य कारण होता है, जबकि टाइप-5 में इंसुलिन के कार्य और शरीर की प्रतिक्रिया अलग तरीके से प्रभावित होती है।
9. क्या डायबिटीज़ के मरीज टाइप-5 डायग्नोसिस के लिए टेस्ट करा सकते हैं?
हाँ, लेकिन इसके लिए एडवांस मेडिकल टेस्टिंग और स्पेशलिस्ट की सलाह ज़रूरी है, क्योंकि अभी यह व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं है।
10. क्या टाइप-5 डायबिटीज़ से होने वाली जटिलताएं अन्य प्रकार जैसी ही होती हैं?
हाँ, अगर नियंत्रित न किया जाए तो यह भी हार्ट, किडनी, आंख और नसों पर असर डाल सकती है।
11. टाइप-5 डायबिटीज़ को रोकने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं?
हेल्दी लाइफस्टाइल, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और समय-समय पर ब्लड शुगर की जांच करने से जोखिम को कम किया जा सकता है।
12. क्या भविष्य में टाइप-5 डायबिटीज़ पर और रिसर्च होगी?
हाँ, मेडिकल एक्सपर्ट्स लगातार इस पर काम कर रहे हैं और उम्मीद है कि आने वाले समय में इसके बारे में और स्पष्ट जानकारी व उपचार के तरीके सामने आएंगे।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी तरह का इलाज शुरू करने या बदलाव करने से पहले डॉक्टर या विशेषज्ञ की सलाह ज़रूर लें।
